लोधी वंश का गौरवशाली इतिहास :--
लेखक – ब्रजलाल लोधी ‘एडवोकेट’, सामाजिक चिंतक, लखनऊ
अध्याय १ :
लोधी वंश की उत्पत्ति और प्राचीन गौरव :--
लोधी, लोधा या लोध – यह नाम भारतीय इतिहास की उन वीर जातियों में आता है जिन्होंने भूमि, श्रम, और शौर्य — तीनों का संगम अपने जीवन में धारण किया।
इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार —
“लोधी प्राचीन आर्य क्षत्रिय कुल से उत्पन्न हैं, जिनका मूलस्थान उत्तर-पश्चिम भारत रहा है। यह वही क्षेत्र है जहाँ से अनेक राजपूत और क्षत्रिय वंशों ने भारत के मध्य और उत्तर भाग में विस्तार किया।”
संस्कृत शब्द “लोध” का अर्थ मिट्टी या भूमि से जुड़ा हुआ है — इससे “भूमिपुत्र” या “भूमिपाल” की भावना निकलती है। इसीलिए लोधी समाज सदैव भूमि, कृषि और रक्षा — इन तीनों से जुड़ा रहा।
बुंदेलखंड, मालवा, राजस्थान और ग्वालियर के अभिलेखों में “लोध” और “लोधा” शब्द 10वीं शताब्दी से ही मिलते हैं।
“गज़ेटियर ऑफ़ राजपूताना” (1879) में लिखा गया — “लोधी जाति राजपूत वंशजों में गिनी जाती है, जिनका प्रमुख कार्य खेती और सैन्य सेवा रहा।”
इससे स्पष्ट होता है कि लोधी वंश का मूल भूमिपाल क्षत्रिय वर्ग था — जो राज्य-सेवा और भूमि-संरक्षण दोनों में अग्रणी था।
अध्याय २ :
लोधी वंश का मध्यकालीन उत्थान और राजकीय शक्ति :--
11वीं से 15वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमोत्तर भाग (गंधार, मुल्तान, कंधार और काबुल) में जब मुस्लिम आक्रमणों की लहरें उठीं, तब वहाँ के अनेक क्षत्रिय, राजपूत और हिंदू योद्धा समुदाय संघर्षरत हुए।
इन्हीं में लोधी वंश भी था।
“Tarikh-e-Firishta” (1609) में स्पष्ट लिखा गया — “लोधी वंश मूलतः भारतीय क्षत्रिय था, जो कालांतर में अफगान क्षेत्र में इस्लाम में परिवर्तित हुआ और भारत लौटकर दिल्ली सल्तनत में प्रमुख स्थान प्राप्त किया।”
इसी लोधी वंश की एक शाखा ने अफगान संघों में प्रमुख भूमिका निभाई और 1451 ई. में बहलोल लोदी ने दिल्ली की गद्दी संभाली।
इस प्रकार दिल्ली सल्तनत का अंतिम शासक वंश लोधी वंश (1451–1526) कहलाया।
लोधी वंश के प्रमुख शासक :--
1.बहलोल लोदी-- (1451–1489) – दिल्ली के सिंहासन पर बैठे; अफगान संघों को एकजुट किया।
2.सिकंदर लोदी-- (1489–1517) – प्रशासनिक सुधार, नई बसावट अगरा (आगरा) की स्थापना।
3.इब्राहीम लोदी-- (1517–1526) – जिसने पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर से वीरगति पाई।
हालाँकि दिल्ली के यह लोधी शासक मुस्लिम थे, परंतु उन्होंने हिंदू प्रजा के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार किया और अनेक मंदिरों, ग्रामों को संरक्षण दिया।
“अइन-ए-अकबरी” (अबुल फ़ज़ल) में लिखा गया — “सिकंदर लोदी के समय प्रजा सुखी थी, भूमि उपजाऊ थी, और शासन में न्याय था।”
इस काल में “लोधी वंश” भारत की राजनीति का ऐसा अध्याय बना जिसने हिंदू क्षत्रिय परंपरा और अफगान सामर्थ्य — दोनों का संगम किया।
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