❖ राम के नाम पर OBC के साथ हुई ठगी --
— मंडल बनाम कमंडल की राजनीति का असली चेहरा :-
(सत्य घटनाओं और ऐतिहासिक क्रम पर आधारित एक चेतनात्मक लेख)
भारत की राजनीति में राम, धर्म, जाति, भावना और सत्ता—ये पाँच शब्द कभी भी अलग नहीं रहे। लेकिन 1990 के दशक में, जब देश में मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई शुरू हुई, तब पहली बार OBC समाज का राजनीतिक भविष्य दो दिशाओं में बांट दिया गया—
एक तरफ सत्ता का वादा,
दूसरी तरफ आस्था का नैरेटिव।
आज, 30 साल बाद, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा होता है कि :--
क्या राम के नाम पर भारतीय जनता पार्टी ने OBC समाज के साथ ठगी की?
इस प्रश्न का उत्तर, इतिहास खुद देता है—“हाँ, और यह ठगी योजनाबद्ध थी।”
❖ मंडल की आँधी और कमंडल की ढाल :--
साल 1990 में मंडल आयोग लागू हुआ।
OBC को पहली बार “राजनीतिक पहचान” मिली—आरक्षण, प्रतिनिधित्व, हिस्सेदारी और न्याय।
लेकिन इसी समय एक दूसरे मोर्चे पर “कमंडल राजनीति” शुरू हुई—राम मंदिर आंदोलन।
सत्ता की राजनीति ने महसूस किया कि यदि OBC को मंडल का लाभ मिल गया, तो राजनीतिक शक्ति स्थायी रूप से “पिछड़ों” के पक्ष में चली जाएगी।
इसीलिए भावनाओं का एक ऐसा तूफ़ान खड़ा किया गया जिसमें OBC नेतृत्व खुद कमंडल के सबसे आगे खड़ा कर दिया गया।
❖ OBC चेहरे: कल्याण सिंह, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, विनय कटियार।
इन नेताओं ने राम आंदोलन को पूरे देश में पहुँचाया।
लेकिन एक कठोर सच्चाई यह है— वे नेतृत्व केवल चेहरा बनकर रहे; निर्णय सत्ता के ऊपर बैठे लोगों का नेतृत्व करता था।
--राम आंदोलन से लाभ किसे मिला? :--
--सत्ता किसके पास गई?
--आर्थिक अवसर किसके पास गए?
--मंत्रालय व निर्णय किसने लिए?
--संगठन पर नियंत्रण किसके हाथ में गया?
OBC चेहरे आगे, असली नेतृत्व पीछे:--
❖ कल्याण सिंह – बलि का बकरा और OBC का सबसे बड़ा नुकसान:--
कल्याण सिंह OBC राजनीति के सबसे बड़े नेता थे।
राम मंदिर आंदोलन की पूरी आग उनके कंधे पर रखी गई।
1992 में ढांचा गिरा —
हर राजनीतिक लाभ BJP ने लिया,
लेकिन बलि का बकरा बना कौन?
👉 कल्याण सिंह — एक OBC नेता।
उनके कारण सरकार गिरी,
उनपर केस चले,
उनका राजनीतिक जीवन धीरे-धीरे कमजोर किया गया।
और आज?
OBC समाज को अधिकार देने की उनकी राजनीतिक लाइन BJP ने कभी स्वीकार नहीं की।
❖ उमा भारती – “राजनीतिक उपयोग” का क्लासिक उदाहरण:--
--उमा भारती जी को राम भक्ति और आक्रामक हिंदूवाद का चेहरा बनाकर आगे किया गया।
लेकिन क्या उन्हें वह सम्मान मिला जो दिया जाना चाहिए था?
--वही पार्टी जिसने उन्हें आगे किया, बाद में किनारे कर दिया।
मुख्यमंत्री बनीं, पर सत्ता टिकने नहीं दी गई।
--आंदोलन का फायदा उन्हें नहीं, बल्कि दिल्ली की नेतृत्व वर्ग को मिला।
❖ साध्वी ऋतंभरा — भावनाओं की राजनीति का उपयोग:--
साध्वी ऋतंभरा ने लाखों लोगों को आंदोलन के लिए प्रेरित किया।
लेकिन जब सत्ता मिली —
उन्हें क्या मिला?
👉 न कोई बड़ा पद, न राजनीतिक अवसर।
उनकी भूमिका “जन-भावना जुटाने” तक सीमित रखी गई।
❖ विनय कटियार — बजरंग दल की नींव डालने वाले, पर आज कहाँ हैं?
विनय कटियार ने मंदिर आंदोलन को गाँव-गाँव तक पहुँचाया।
लेकिन क्या BJP ने उन्हें OBC नेतृत्व का राष्ट्रीय चेहरा बनाया?
कभी नहीं।
आज भी वह हाशिए पर हैं।
क्यों?
क्योंकि OBC नेतृत्व को असली शक्ति में आने देना पार्टी की संरचना में ही शामिल नहीं है।
❖ OBC का वास्तविक नुकसान क्या हुआ?
राम आंदोलन ने OBC समाज से तीन बड़ी चीजें छीन लीं—
1.राजनीतिक नेतृत्व :--
यदि OBC राजनीति मंडल के रास्ते जाती, तो उत्तर प्रदेश और बिहार के 60–70% लोगों के हाथ में सत्ता आती।
लेकिन कमंडल ने यह रास्ता रोक दिया।
2 शिक्षा, नौकरी, प्रशासन में प्रतिनिधित्व :--
मंडल के बाद OBC को नौकरियों में अधिकार मिल रहा था।
कमंडल का उभार इस मुद्दे को पीछे धकेलने में सफल हुआ।
3.जातीय जागरूकता :--
OBC समाज को “हिंदू पहचान” के भावनात्मक चक्र में इतना बांधा गया कि
वह अपने हिस्सेदारी के सवाल भूल गया।
❖ सबसे बड़ी ठगी – ‘राम के नाम पर अधिकारों का विसर्जन’:--
---राम मंदिर बना — और यह आस्था का विषय है।
लेकिन पूछना चाहिए:
--मंदिर बनने से OBC की नौकरी बढ़ी?
--प्रशासन में OBC की सीट बढ़ी?
--OBC मुख्यमंत्री बने?
--OBC मंत्रियों की संख्या बढ़ी?
--आर्थिक स्थिति सुधरी?
एक भी उत्तर “हाँ” नहीं है।
सिर्फ वोट बढ़े —
लेकिन अधिकार घटे।
यह सबसे बड़ी ठगी है।
❖ बैकवर्ड और दलित को जागना होगा:--
आज जरूरत है कि पिछड़े और 5दलित समाज समझें—
👉 राम किसी पार्टी की संपत्ति नहीं।
👉 धर्म आपका है, पर अधिकार भी आपका है।
👉 आस्था और राजनीति को अलग-अलग देखना सीखें।
👉 जिन नेताओं को आगे कर उपयोग किया गया, उनके साथ क्या हुआ — यह आपका भविष्य भी तय करता है।
❖ निष्कर्ष – मंडल रोकने के लिए कमंडल बनाया गया :--
जिससे ज्यादा तर इसमें OBC नेताओं का उपयोग हुआ।
मगर सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं के समाज का हुआ।
यह लेख किसी धर्म के खिलाफ नहीं,
बल्कि राजनीतिक जागरूकता के पक्ष में है।
लेखक -- ब्रजलाल लोधी एडवोकेट, सामाजिकचिंतक
Leave a comment
Your email address will not be published. Required fields are marked *