
यह कौन से हिन्दू है????
जिनके अंदर सदियों से ज़हर भरा है!
अब प्रश्न यह है कि यदि यही असली हिंदू हैं
तो हम कौन हैं?????????
🌿 “जब न्याय ने अपना धर्म निभाया”
वो दिन भी आम दिनों जैसा था,
पर उस दिन अदालत की दीवारों ने
जाति का ज़हर महसूस किया।
एक व्यक्ति उठा —
हाथ में जूता था, मन में नफ़रत।
वह भूल गया कि संविधान में--
“कुर्सी जाति से नहीं, क़ाबिलियत से मिलती है।”
जूता हवा में नहीं,
हमारे समाज की सोच पर गिरा।
उस सोच पर —
जो अब भी ऊँच-नीच में विश्वास रखती है।
पर न्यायमूर्ति गवई डरे नहीं,
क्योंकि उनके पीछे संविधान खड़ा था,
और उनके भीतर बाबा साहब का विचार जीवित था।
यह घटना किसी एक व्यक्ति का अपमान नहीं,
यह हमारे समाज की परछाई है।
वो परछाई जो तब तक मिटेगी नहीं,
जब तक हर मन बराबरी से नहीं सोचता।
जूता गवई पर नहीं,
हम सब पर फेंका गया है —
क्योंकि हमने अब तक
“समानता” को किताबों में रखा,
ज़िंदगी में नहीं।
पर विश्वास रखिए —
संविधान अब भी ज़िंदा है।
और जब तक वह जीवित है,
कोई भी जूता
भारत के न्याय को नहीं झुका सकता।
जय भीम। जय संविधान। जय भारत।
लेखक -- ब्रजलाल लोधी एडवोकेट सामाजिक चिंतक
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