
🌿 “जब मौन ने अपराध किया”
वो अदालत थी — न्याय की प्रतीक,
पर उस दिन न्याय पर हमला हुआ।
जूता हवा में नहीं,
भारत के संसद पर फेंका गया था।
पर उससे बड़ा अपराध क्या था?
वो जूता नहीं — वो मौन था,
जो संसद से लेकर गाँव तक पसरा रहा।
कहाँ गए वो नेता, सांसद, विधायक और जनसेवक,
जो मंचों पर “समानता” की कसमें खाते हैं?
कहाँ गए वो, जिनकी जिम्मेदारी थी
दलित और पिछड़े समाज की आवाज़ बनना?
अगर तुमने कल भी मौन रखा,
तो याद रखो —
कल बारी तुम्हारी भी आ सकती है।
क्योंकि अन्याय किसी एक की कुर्सी तक सीमित नहीं रहता।
क्या तुम्हारे कान बहरे हो गए?
क्या तुम्हारी जातियाँ जाग उठीं?
क्यों नहीं उठी आवाज़,
जब “एक दलित न्याय” पर हमला हुआ?
बाबा साहब ने कहा था —
“समानता अगर कागज़ पर रह जाए,
तो लोकतंत्र बस एक ढोंग है।”
जूता किसी एक व्यक्ति पर नहीं,
सम्पूर्ण मानवता पर फेंका गया था —
उस श्रमिक पर, उस किसान पर,
उस छात्र पर, जो अब भी बराबरी का सपना देखता है।
पर अफसोस!
तुम्हारी भाषणों में संविधान है,
पर दिलों में अपमान है।
तुम्हारी चुप्पी —
वही चुप्पी है जो सदियों से
दलितों और पिछड़ों की चीख़ दबाती आई है।
अगर यही तुम्हारा हिंदुत्व है —
तो यह मानवता का अपमान है।
अगर यही तुम्हारी राजनीति है —
तो यह लोकतंत्र का शोकगीत है।
पर याद रखो —
यह संविधान हर उस अन्याय के बाद
और मज़बूत होकर खड़ा होता है।
जब तक एक भी “गवई” अन्याय के सामने
डटा रहेगा,
तब तक यह देश
बाबा साहब के सपने से जिएगा।
और तुम, जो चुप बैठे हो —
याद रखो, कल तुम्हारी भी बारी आ सकती है।
संविधान के आगे, न्याय के आगे,
कोई जूता तुम्हारे मौन को नहीं बचा पाएगा।
जय भीम। जय संविधान। जय मानवता।
लेखक - ब्रजलाल लोधी एडवोकेट सामाजिक चिंतक
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