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क्या अब भी शूद्र चौथे पायदान पर हैं? — समाज के पुनर्गठन की पुकार :-

Oct 30, 2025  Brij Lal Lodhi  19 views
क्या अब भी शूद्र चौथे पायदान पर हैं? — समाज के पुनर्गठन की पुकार :-

🔸 क्या अब भी शूद्र चौथे पायदान पर हैं? — समाज के पुनर्गठन की पुकार :-
        ‌    भारतीय सभ्यता की जड़ें विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध मानी जाती हैं। यह वह भूमि है जहाँ वेद, उपनिषद और दर्शन ने मानवता की सबसे ऊँची उड़ान भरी। परंतु इसी भूमि पर एक समय ऐसा भी आया जब मनुष्य को मनुष्य से नीचा बताने का सिलसिला शुरू हुआ — और यही वह क्षण था जब धर्म के नाम पर अधर्म की नींव रखी गई।

समाज को चार वर्गों में बाँट दिया गया — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
यह विभाजन कर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर स्थायी बना दिया गया।
ब्राह्मण ने ज्ञान का अधिकार अपने पास रखा, क्षत्रिय ने शक्ति का, वैश्य ने धन का — और शूद्र से सब अधिकार छीन लिए।
शूद्र को बना दिया गया "सेवक", "अस्पृश्य", “अधम” — जबकि वही वर्ग समाज की सबसे बड़ी आर्थिक, श्रमशील और रचनात्मक शक्ति था।

🔹 अन्याय का यह तंत्र — मनु के कलम से व्यवस्था के सिंहासन तक

मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने इस अन्याय को “धार्मिक व्यवस्था” का रूप दिया।
जिस समाज ने धर्म को मानवता से ऊपर रखा, उसने मनुष्य को दास बना दिया।
उस समय शूद्र के पास ना भूमि थी, ना शिक्षा, ना सम्मान, और ऊपर से उसे यह भी समझा दिया गया कि यह उसका “कर्मफल” है।
यह सिर्फ़ सामाजिक नहीं, मानसिक दासता की जंजीर थी।
ब्राह्मण ने ज्ञान के द्वार बंद कर दिए ताकि शासन सदैव उसके नियंत्रण में रहे —
क्षत्रिय ने तलवार से शासन चलाया ताकि विद्रोह कभी न उठ सके —
वैश्य ने धन के माध्यम से व्यवस्था को पोषित किया ताकि सत्ता हमेशा टिके रहे —
और शूद्र को इन तीनों की सेवा में बाँध दिया गया।

🔹 जागरण की शुरुआत — समाज के असली संत और सुधारक

समय बदला, चेतना जगी।
जब समाज की साँसें अन्याय से घुटने लगीं, तब संत रविदास, संत कबीर, ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहू जी महाराज, रामास्वामी नायकर, और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महापुरुषों ने इस व्यवस्था को चुनौती दी।
उन्होंने कहा — “ईश्वर सबका एक है, मनुष्य कोई नीचा या ऊँचा नहीं।”
डॉ. अंबेडकर ने समाज को संविधान के रूप में वह शक्ति दी, जो मनु की व्यवस्था को ध्वस्त करने में सबसे बड़ा हथियार बनी।
मान्यवर कांशीराम ने इस चेतना को आंदोलन में बदला —
उन्होंने कहा,

“जो पढ़ेगा, वही लड़ेगा;
जो लड़ेगा, वही बढ़ेगा।”

उन्होंने वंचित समाज को सिखाया कि सत्ता प्राप्त किए बिना सम्मान नहीं मिलता, और सम्मान बिना आत्मसम्मान के अधूरा है।

🔹 वर्तमान परिवेश — जब शूद्र ने अपनी किस्मत स्वयं लिखी

आज शूद्र समाज ने अपने परिश्रम और संघर्ष से वह स्थान प्राप्त किया है जिसे कभी असंभव माना जाता था।
वह समाज, जो कभी खेतों में मेहनत करता था, आज विश्वविद्यालयों, प्रशासनिक सेवाओं, उद्योगों, तकनीक, राजनीति, कला और संस्कृति — हर क्षेत्र में अग्रणी है।
जिसे “सेवक” कहा गया, उसने सेवा को शक्ति में बदला,
जिसे “अशिक्षित” कहा गया, उसने शिक्षा को शस्त्र बना लिया,
जिसे “हीन” कहा गया, उसने सम्मान की परिभाषा बदल दी।

आज यह समाज आत्मनिर्भर भारत की रीढ़ है।
खेती हो, उद्योग हो या राजनीति — शूद्र वर्ग के बिना कोई तंत्र चल ही नहीं सकता।
इस दृष्टि से देखें तो जो वर्ग कभी चौथे पायदान पर था, आज समाज के शीर्ष पायदान पर खड़ा है।

🔹 ब्राह्मणवाद की परतें — अब कौन है “शूद्र”?

अब समय आ गया है कि हम यह प्रश्न करें —
क्या "शूद्र" वह है जो समाज की सेवा करता है?
या "शूद्र" वह है जो समाज को बाँटता है, शोषण करता है और अंधविश्वास फैलाता है?

आज “शूद्र” का अर्थ बदल गया है —
जो मानवता को विभाजित करता है, वह “शूद्र” है,
जो समाज को जोड़ता है, वह “श्रेष्ठ” है।

आज “ब्राह्मण” वह नहीं जो वेद जानता है,
बल्कि वह है जो ज्ञान सबके लिए सुलभ बनाता है।
आज “क्षत्रिय” वह नहीं जो तलवार चलाता है,
बल्कि वह है जो अन्याय के खिलाफ़ खड़ा होता है।
आज “वैश्य” वह नहीं जो धन कमाता है,
बल्कि वह है जो श्रम का सम्मान करता है।
और “शूद्र” वह नहीं जो सेवा करता है,
बल्कि वह है जो सेवा के माध्यम से समाज निर्माण करता है —
यानी वह सच्चा समाज निर्माता है।

🔹 सामाजिक पुनर्गठन की आवश्यकता:-

अब समाज को पुराने ढाँचे में नहीं, नए संतुलन में देखना होगा।
जाति नहीं, कर्म ही व्यक्ति की पहचान बने।
ज्ञान, परिश्रम और नैतिकता — यही नया वर्गीकरण हो।
अब समाज को चार नहीं, एक वर्ग में बदलना होगा — “मानव वर्ग”।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि जो व्यवस्था बाँटती है, वह धर्म नहीं अधर्म है;
और जो जोड़ती है, वही सच्चा धर्म है।

🔹 निष्कर्ष — नया युग, नई परिभाषा:-

आज इतिहास हमारे सामने खड़ा होकर पूछ रहा है —
“क्या तुम वही समाज बनाना चाहते हो जो हजारों वर्ष पहले अन्याय में जीता था,
या वह समाज जो समानता और सम्मान में सांस लेता है?”

अब यह तय करना है कि “शूद्र” शब्द अपमान का प्रतीक रहेगा या सम्मान का प्रतीक बनेगा।
क्योंकि आज वही वर्ग समाज का उत्पादक है, कर्मशील है, सृजनशील है —
और वही वर्ग भारत के वास्तविक उत्थान का आधार है।

इसलिए अब यह कहना उचित होगा —

“जो समाज का निर्माण करता है, वही सच्चा ब्राह्मण है;
और जो समाज को बाँटता है, वही असली शूद्र।”

लेखक - ब्रजलाल लोधी एडवोकेट सामाजिक चिंतक


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